Facilitators Share - Poems

by Sudha Ravi and Kalpana Kotwal

Patrick Schmitt (flickr)

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Inside Out

by Sudha Ravi

When the way out, was the way in....
I thought and thought to myself, which is out and where is in? Until when….
I stopped my logical brain from being taxed,
I let go of my Ought’s and Shoulds,
I put down my mask and bared it all,

The lesser mortal that I was,
With all the pains, joys and aches, small or big, I cannot proclaim.
With nothing great to claim for my 'I',
I sat down in vain, staring at nothing in particular for a while.

When a bright red rose, caught my sight, with dew drops shining bright and light.
Oh... so beautiful!! so lovely!!! I said to self, still deep in silence and in need for help.
I looked at the soil... dark and black, rich it seemed, with freshly added dung on top.
I told myself, the flower has bloomed bright and nice, in the midst of all this murky dung!!!

How could it be different, for me or others? I asked myself, continuing to stare as if forever.
What I had bared with my unsure hands,
Was the manure, which I had forgotten and stacked secure.
I let myself touch and see, the manure it was, yes, indeed!!

Hesitantly, I dug a little deeper, into the murky dung that seemed so much bigger.
Now that I claimed all of it as surely mine,
The effort of the rose and the dung, did not go waste in just being benign.
I saw the unfolding happen within me, slow and sure it definitely was.
A full-fledged rose I am and I am not – how does it matter when my heart can sing and dance with Nature?

स्पर्श

by Kalpana Kotwal

’संकलन’ में हिस्सा लेने हेतु
’भूमि’ के प्रांगण में
माँ तो चल दी थी
छोड़कर बिन देखे मुझे !

न जाने कैसे गुजरेंगे,
सड़कों से लंबे दिन
और जागी स्याह रातें ।
भीड़ में अपरिचित चेहरों में,
किसी अपने को तलाशते नयन।
सिमटी , सकुचाई सी-
थी खड़ी एक कोने में ।
चौंक गई सुन नाम अपना ,
जाने कौन ! मुझे भी इस भीड़ में
मुड़कर देखा , तो अपनी ही परछाई थी,
गुफ़्तगू करने की लालसा से
पास मेरे वो आई थी ।
बरसों से ओढ़ी खामोशी की चादर को
कैसे खुद पर से गिर जाने देती ,
मैं इज़हार करूँ तो कैसे करूँ ,
दुविधा रही बहुत अंतर्मन में ।


Photo Courtesy : Dad son hand wallpaper

दिन बीते और पाया
संकलन है किस्से - कहानियों का,
विचारों का,  नज़रियों का,
दृष्टिकोण और संभावनाओं का,
प्रकृति और जीवन की अनुभूतियों का ।

जाना कि एक लड़ी हूँ, एक मज़बूत कड़ी हूँ ,
अंश हूँ कभी , तो कभी हूँ संपूर्ण भी ।
रंग मुझमें भी है , फिज़ाऒं जैसे अनेक,
हवा सी बह सकती हूँ , बिन पंखों के उड़ सकती हूँ
क्षमता है मुझमें , धरा के तन मन को सिचिंत करने की
जल सकती हूँ, गर तो जला भी सकती हूँ,
देख कर स्वरूप यह अपना,
हैरान सी हूँ ....
सामना हुआ है खुदका खुद से,
आज पहली बार

कोई झिंझोड़ गया,
दिल की गहराईयों से,
दिल को  छू गया ।
यह किसने मेरे वज़ूद को स्पर्श किया ।

वादा है यह मेरा मुझसे , इस राह पर चलूँगी
मंज़िल ना  भी मिलें , कोई राह तो पा जाऊँगी ।
उलझनों और कश्मकश में
‘संकलन’ ने 
भरोसे , हौसले और उम्मीद का
चिराग जलाया है मेरे ....